RBI के एंट्री गेट पर क्यों है कुबेर के परिवार के यक्ष-यक्षिणी के स्टेच्यू? जानें वजह

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नई दिल्ली स्थित आरबीआई के मुख्य द्वार पर धन के देवता कुबेर के सेवक रक्षा कर रहे हैं. उद्योग और कृषि के माध्यम से देश की धन-संपदा में वृद्धि और रक्षा के लिए आरबीआई के मुख्य द्वार पर कुबेर के यक्ष-यक्षिणी विराजमान हैं. शास्त्रों में इन्हें धन के देवता कुबेर का सेवक बताया गया है. हा...

नई दिल्ली स्थित आरबीआई के मुख्य द्वार पर धन के देवता कुबेर के सेवक रक्षा कर रहे हैं. उद्योग और कृषि के माध्यम से देश की धन-संपदा में वृद्धि और रक्षा के लिए आरबीआई के मुख्य द्वार पर कुबेर के यक्ष-यक्षिणी विराजमान हैं. शास्त्रों में इन्हें धन के देवता कुबेर का सेवक बताया गया है. हाथ में धन की पोटली लिए यक्ष धन-संपदा और औद्योगिक समृद्धि का प्रतीक हैं. वहीं कृषि की उपज को थामे हुए यक्षिणी कृषि, धरती की उर्वरता और अन्न-समृद्धि का प्रतीक हैं. भारत कृषि प्रधान देश है और आजादी के बाद औद्योगिक रूप से विकास करने की तत्कालीन राजनीतिक इच्छा भी इन मूर्तियों में झलकती है.  कौन हैं यक्ष और यक्षिणी? शास्त्रों में में यक्ष को एक प्रकार का दिव्य या अर्धदैविक प्राणी बताया गया है. इनका संबंध धन, पृथ्वी के गर्भ में छिपी संपदा, जल, वन और प्राकृतिक संसाधनों से रहा है. इन्हें शक्तिशाली, समृद्ध और रक्षक स्वरूप में दिखाया जाता है. जबकि यक्षिणी को यक्ष का स्त्री रूप माना जाता है. प्राचीन कला में वह उर्वरता, सौंदर्य, प्रकृति, वृक्षों, फल-फूल और कृषि संपन्नता का प्रतीक रही है. प्राचीन मूर्तियों में यक्षिणियों को वृक्षों की शाखाओं, फूलों और फल-फसलों के साथ दिखाने की परंपरा मिलती है.

कुबेर से क्या है इनका संबंध? जल तत्व और उत्तर दिशा में कुबेर धन के देवता हैं. लेकिन यक्षों का क्षेत्र इससे कहीं व्यापक है. वे धरती में छिपी संपदा, मणि-माणिक्य, खनिज, जल और वन संपदा के रक्षक भी माने जाते थे. यही कारण है कि यक्षों की अवधारणा को केवल धन रखने वाले प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि संपदा की सुरक्षा और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. इसी वजह से RBI की एंट्रेंस पर यक्ष-यक्षिनी के स्टेच्यू प्रतीकात्मक रूप से स्थापित किए गए हैं. 

यक्ष-यक्षिणी की पूजा और प्राचीन इतिहास यक्ष पूजा की परंपरा बहुत प्राचीन है. बौद्ध और जैन साहित्य में भी यक्षों का उल्लेख मिलता है. कई स्थानों पर इन्हें स्थानीय रक्षक देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और इन्हें विधिवत पूजा भी की जाती है. हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और धार्मिक परंपराओं में इनके स्वरूप और मान्यताएं एक जैसी नहीं रही है. भारतीय लोक परंपराओं में मणिभद्र जैसे यक्षों की पूजा का भी विशेष महत्व रहा है.

कब है धनतेरस? हर साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि पर धूमधाम से धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन देवताओं के धन के संरक्षक कहे जने वाले कुबेर महाराज की विधिवत पूजा की जाती है. इस साल यह पर्व 6 नवंबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा. मान्यता है कि इस दिन कुबेर महाराज की पूजा से धनधान्य में खूब वृद्धि होती है. जो लोग धन त्रयोदशी पर कुबेर को प्रसन्न कर लेते हैं, उनके जीवन में कभी धन का अकाल नहीं पड़ता है.

Original Source
https://www.aajtak.in/religion/news/story/dhanteras-2026-kuber-yaksha-yakshini-statue-on-rbi-entracnce-gate-reason-signifance-who-are-yaksha-yakshini-tvisu-dskc-2687479-2026-11-05?utm_source=rss
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