राइट टू रिकॉल... चुने हुए नेता को पद से हटाने का अधिकार! समझिए कैसे होती है इसकी वोटिंग?

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मध्यप्रदेश के निवाड़ी में बुधवार को एक चुनाव हुए, जिसमें वोटिंग किसी उम्मीदवार को चुनने के लिए बल्कि चुने हुए उम्मीदवार को हटाने के लिए हुई. चुनाव के इस फॉरमेट को बोलते हैं राइट टू रिकॉल. वैसे अभी ये व्यवस्था पूरे भारत में नहीं है और कुछ राज्यों में है, जिसमें चुने हुए उम्मीदवारो...

मध्यप्रदेश के निवाड़ी में बुधवार को एक चुनाव हुए, जिसमें वोटिंग किसी उम्मीदवार को चुनने के लिए बल्कि चुने हुए उम्मीदवार को हटाने के लिए हुई. चुनाव के इस फॉरमेट को बोलते हैं राइट टू रिकॉल. वैसे अभी ये व्यवस्था पूरे भारत में नहीं है और कुछ राज्यों में है, जिसमें चुने हुए उम्मीदवारों को काम अच्छा ना करने पर पद से हटाया जा भी सकता है. अभी ये चुनाव निवाड़ी के जेरोन खालसा नगर परिषद की अध्यक्ष कुसुम पस्तोर के खिलाफ हुए थे. आरोप था कि उन्होंने काम अच्छा नहीं किया और अब उनके खिलाफ वोटिंग हुई है, जिसके रिजल्ट आज आने हैं. अगर रिजल्ट उनके खिलाफ आए तो उन्हें पद से हटना होगा. 

ऐसे में जानते हैं कि आखिर ये  राइट टू रिकॉल होता क्या है, किन पदों पर ये लागू होता है और इसमें किस तरह से चुने हुए उम्मीदवार को पद से हटाया जाता है. साथ ही ये भी जानेंगे इसमें वोट देने वाले लोग कौन होते हैं और फिर चुनाव चिह्न क्या होता है... समझते हैं इसका पूरा गणित. 

सबसे पहले जानते हैं कि राइट टू रिकॉल है क्या... राइट टू रिकॉल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाताओं को यह अधिकार मिलता है कि वे अपने द्वारा चुने गए किसी प्रतिनिधि को उसका सामान्य कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वोट के जरिए उसके पद से हटा सकते हैं. जैसे मान लीजिए किसी नगर परिषद में जनता ने पांच साल के लिए एक अध्यक्ष चुना. चुनाव के बाद लोगों को लगता है कि अध्यक्ष काम नहीं कर रहा, वादे पूरे नहीं कर रहा या उसके कामकाज से लोग संतुष्ट नहीं हैं. 

सामान्य स्थिति में जनता को अगले चुनाव तक इंतजार करना पड़ता है. लेकिन, जहां राइट-टू-रिकॉल की व्यवस्था है, वहां जनता को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उस प्रतिनिधि को हटाने का मौका मिलता है. यह कोई नया चुनाव नहीं होता, जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति को चुनना हो.  पहले यह तय होता है कि मौजूदा प्रतिनिधि अपनी कुर्सी पर बना रहेगा या नहीं. 

भारत के संविधान में राइट टू रिकॉल का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. यह मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है, परंतु इसे लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए कानूनी और नीतिगत सुधारों के माध्यम से लागू किया जा सकता है.

लेकिन, यहां एक बात ये जानना जरूरी है कि ये हर पद के लिए नहीं होता. इसके अंतर्गत विधायक और सांसद नहीं आते हैं. आसान भाषा में कहें तो यह जनता का अपने चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार है. भारत में आमतौर पर यह व्यवस्था मुख्य रूप से स्थानीय निकायों यानी नगर निकायों और पंचायतों तक सीमित है. जैसे कि नगर परिषद अध्यक्ष, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, ग्राम पंचायत के सरपंच और दूसरे पंचायत प्रतिनिधि. 

कहां कहां है.... हर राज्य में अलग-अलग पदों के लिए राइट टू रिकॉल है. मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, बिहार आदि शामिल है. यानी इन राज्यों में अलग पदों पर चुने हुए उम्मीदवारों को पद से हटाने का अधिकार है. कुछ राज्यों में ये पंचायत समितियों तक सीमित है. सभी राज्यों में एक जैसा कानून नहीं है और प्रक्रिया भी थोड़ी-थोड़ी अलग है. 

अगर दुनिया की बात करें तो राइट टू रिकॉल पूरी दुनिया में बहुत आम नहीं है, लेकिन कुछ देशों में यह लागू है. अमेरिका के कई राज्यों में स्थानीय स्तर पर यह प्रावधान है. स्विट्जरलैंड और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में भी इस तरह की व्यवस्था मौजूद है. 

ये तो आपने समझ लिया कि ये राइट टू रिकॉल है क्या... अब सवाल है कि अगर किसी क्षेत्र के नगर परिषद अध्यक्ष को अगर हटाना हो तो उसके लिए क्या करना होगा... 

जैसे मान लीजिए नगर परिषद के अध्यक्ष को हटवाना है तो नगर परिषद के पार्षदों में से कम से कम 75 फीसदी पार्षदों को अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने होंगे. खास बात ये है कि अध्यक्ष के पद संभालने के शुरुआती तीन साल में राइट-टू-रिकॉल की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती. तीन साल बाद ऐसा कर सकते हैं और एक कार्यकाल में एक बार ही किया जा सकता है. उदाहरण के लिए नगर परिषद में 20 निर्वाचित पार्षद हैं तो कम से कम 15 पार्षदों के हस्ताक्षर जरूरी होंगे. जैसे अभी मध्य प्रदेश में जहां चुनाव हुए हैं, वहां 15 में से 12 पार्षदों ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था. 

इसके बाद ये हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव जिले के कलेक्टर को सौंपा जाएगा.  फिर कलेक्टर देखेगा कि प्रस्ताव कितना वाजिब और ठीक है. सब सही मिलने पर प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा जाएगा. राज्य सरकार इस प्रस्ताव को राज्य निर्वाचन आयोग के पास भेजेगी. इसके बाद आयोग मतदान की तारीख और दूसरी व्यवस्थाएं तय करेगा. फिर चुनाव होंगे. यानी आम जनता सीधे राइट टू रिकॉल का यूज नहीं करती, बल्कि वहां के चुने हुए पार्षद ये प्रस्ताव लाते हैं. 

अब बारी है चुनाव की. जब चुनाव की तारीख आ जाती है तो चुनाव आयोग वोट करवाता है. इसमें सामान्य चुनाव की तरह उम्मीदवारों की लंबी लिस्ट नहीं होती, मतदाता को यह बताना होता है कि वह मौजूदा अध्यक्ष को हटाना चाहता है या नहीं. अब आप सोच रहे होंगे कि वोट देते कैसे होंगे, क्या उसमें भी चुनाव चिह्न होते हैं?

दरअसल, उसमें दो चुनाव चिह्न पर वोट डलते हैं. एक चुनाव चिह्न होता है भरी हुई कुर्सी और एक खाली कुर्सी. भरी हुई कुर्सी का मतलब है कि अध्यक्ष को पद पर बने रहना चाहिए. खाली कुर्सी  का मतलब है कि अध्यक्ष को पद से हटा देना चाहिए. मतदाता इनमें से किसी एक विकल्प को चुनता है. इसमें उस नगर परिषद या निकाय के लोग वोट देते हैं. उदाहरण के लिए जेरोन खालसा में अध्यक्ष को हटाने के लिए पूरे नगर परिषद क्षेत्र में मतदान हुआ था. वहां 7,799 मतदाता थे और 4,798 लोगों ने वोट डाले. 

फिर खाली कुर्सी या भरी कुर्सी की काउंटिंग होगी. अगर भरी कुर्सी को कुल मतदाताओं में से 50% से अधिक वोट मिलेंगे तो उम्मीदवार उसी पद पर बना रहेगा. अगर मान लीजिए खाली कुर्सी जीत जाए तो पद छोड़ना होगा. 

क्या इन चुनावों में प्रचार होता है?

अब जब आम चुनाव होते हैं तो चुनाव से पहले काफी प्रचार होता है, झंडे लगाए जाते हैं, घर-घर प्रचार होता है. इस चुनाव में वैसे प्रचार नहीं होता, लेकिन फिर लोग ये मैसेज देते हैं कि उन्होंने अच्छे काम किए हैं या नहीं. पक्ष और विपक्ष काम पर ही बात करता है कि पद पर आसीन व्यक्ति ने काम किया है या नहीं. 

अध्यक्ष को हटाने वाले जनता को बताते हैं कि अध्यक्ष ने अपने कार्यकाल में काम नहीं किया. इलाके की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ. अध्यक्ष को पद पर बने रहने का मौका नहीं मिलना चाहिए.  वहीं, अध्यक्ष को बचाने वाले कहते हैं कि हमारे काम को देखिए. हमारे खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं. हमें अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका मिलना चाहिए.  

Original Source
https://www.aajtak.in/information/story/right-to-recall-how-voting-process-works-madhya-pradesh-nivadi-voting-tedu-dskc-2689614-2026-11-06?utm_source=rss
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