चुनावी झटके के बाद क्या ट्रंप टैरिफ पर फिर से करेंगे विचार? सबसे बड़ा सवाल
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को लगे बड़े राजनीतिक झटके के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उनकी टैरिफ नीति को लेकर है. क्या अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी और संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत ट्रंप को अपनी व्यापार नीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर करेगी? क्या इसका असर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटकी ट्रेड डील पर भी पड़ेगा? अमेरिकी मामलों के जानकार डॉ. संजीव श्रीवास्तव का मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद ट्रंप पर अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है. इससे भारत के साथ व्यापार समझौते की बातचीत को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है.
दरअसल, इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में जीत हासिल की है. यह ट्रंप की आर्थिक नीतियों के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. अमेरिका में महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें और लिविंह कॉस्ट मतदाताओं की बड़ी चिंता बनकर उभरे हैं. इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन की आक्रामक टैरिफ नीति ने भारत जैसे मित्र देशों के साथ भी व्यापारिक तनाव बढ़ाया है.
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ट्रंप को अपनी टैरिफ नीति पर क्यों करना पड़ सकता है विचार?
आजतक से बातचीत में रणनीतिक मामलों के जानकार डॉ. संजीव श्रीवास्तव ने कहा कि चुनावी नतीजों के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी आर्थिक नीतियों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है. इसका सकारात्मक असर भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत पर भी हो सकता है.
संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिकी मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा मुद्दा जीवनयापन की बढ़ती लागत और महंगाई रहा है. लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ के जरिए दुनियाभर के देशों को निशाना बनाया. इसमें भारत जैसे दोस्त देश भी शामिल रहे हैं.
जानकार ने कहा कि ट्रंप की फैसले लेने की शैली काफी हद तक लेन-देन पर आधारित रही है. उनकी कारोबारी पृष्ठभूमि का असर उनकी नीतियों में भी दिखाई देता है. ऐसे में चुनावी नतीजों के बाद उम्मीद है कि वह अपने कुछ फैसलों पर फिर से विचार करेंगे और व्यापारिक साझेदारों के साथ ज्यादा व्यावहारिक रुख अपनाएंगे.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील में अब तक क्या हुआ?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत लंबे समय से चल रही है. फरवरी 2026 में दोनों देशों ने अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक फ्रेमवर्क का ऐलान किया था. 6 फरवरी को घोषित इस फ्रेमवर्क के तहत अमेरिका ने कुछ भारतीय उत्पादों पर 18 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया था. हालांकि, यह व्यवस्था औपचारिक रूप से पूरी नहीं हो सकी और इसे लागू भी नहीं किया गया.
इसके बाद 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने टैरिफ व्यवस्था की कानूनी तस्वीर बदल दी. 'लर्निंग रिसोर्सेज इंक बनाम ट्रंप' मामले में कोर्ट ने कहा कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता. इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की बड़ी आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए टैरिफ का कानूनी आधार खत्म हो गया. इसमें प्रस्तावित 18 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ की व्यवस्था भी शामिल थी.
इसके बाद अमेरिका ने टैरिफ लगाने के लिए दूसरा ढांचा अपनाया. जुलाई 2026 में कुछ भारतीय उत्पादों पर 10 फीसदी अतिरिक्त सेक्शन 301 ड्यूटी को अंतिम रूप दिया गया. हालांकि, इसमें कई तरह की छूट भी रखी गईं.
भारत के कितने निर्यात पर लग रहा है अतिरिक्त टैरिफ?
भारत के वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक, अमेरिका को होने वाले भारत के करीब 45 फीसदी निर्यात को इस अतिरिक्त ड्यूटी के दायरे से बाहर रखा गया है. इसमें जेनेरिक दवाएं और स्मार्टफोन जैसे उत्पाद शामिल हैं. वहीं, बाकी करीब 55 फीसदी भारतीय निर्यात पर यह शुल्क लागू होता है. हालांकि, इसमें भी कुछ उत्पादों को मिली छूट और दूसरे टैरिफ नियमों का ध्यान रखा जाता है.
इसके अलावा, रूस से तेल खरीदने के चलते भारत पर लगाया गया अलग से 25 फीसदी दंडात्मक टैरिफ फरवरी 2026 में पहले ही हटा दिया गया था. एक और अहम घटनाक्रम में ट्रंप ने 16 अक्टूबर को एक कार्यकारी आदेश जारी किया. इसके तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों को निशाना बनाने वाले नए सेकेंडरी टैरिफ और ग्राहम एक्ट के तहत कुछ प्रतिबंधों से छूट दी गई.
इन बदलावों के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) अभी तक पूरा नहीं हुआ है. बातचीत में बाजार तक पहुंच, कृषि उत्पादों, टैरिफ में मिलने वाली छूट और अमेरिकी व्यापार नीति जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं.
अक्टूबर में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया था कि समझौते के पहले चरण की बातचीत अंतिम कानूनी ड्राफ्टिंग के स्तर पर पहुंच गई है. हालांकि, भारत की कोशिश है कि उसके निर्यातकों को दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर और बराबरी का टैरिफ लाभ मिले.
क्या भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी पर भी पड़ेगा असर?
ट्रंप को चुनाव में लगे झटके का असर सिर्फ उनकी घरेलू राजनीति और आर्थिक नीतियों तक सीमित रहेगा या इसका भारत के साथ रक्षा संबंधों पर भी प्रभाव पड़ेगा? इस सवाल पर डॉ. संजीव श्रीवास्तव का मानना है कि रक्षा साझेदारी में किसी बड़े बदलाव की आशंका नहीं है.
उनके मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग की रफ्तार जारी रहने की उम्मीद है. दोनों देशों के रणनीतिक हित इस साझेदारी को आगे बढ़ाने से जुड़े हैं. उन्होंने खास तौर पर भारत के स्वदेशी तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी कंपनी GE के इंजन की समय पर आपूर्ति को अहम बताया.
संजीव श्रीवास्तव ने कहा कि अगर तेजस विमानों के लिए GE इंजन समय पर मिलते हैं तो इससे दोनों देशों के बीच भरोसा और सहयोग मजबूत होगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ रचनात्मक रुख अपनाएगा और रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाएगा.
भारत के लिए क्यों अहम है अमेरिकी चुनाव का नतीजा?
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजे भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकते हैं. हालांकि, संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का मतलब यह नहीं है कि ट्रंप की व्यापार नीति अपने आप बदल जाएगी या भारत के साथ ट्रेड डील तुरंत हो जाएगी. राष्ट्रपति के पास व्यापार से जुड़े कई फैसले लेने की कार्यकारी शक्तियां अब भी हैं.
लेकिन घरेलू स्तर पर महंगाई और जीवनयापन के खर्च को लेकर बढ़ता दबाव ट्रंप प्रशासन को अपनी आर्थिक नीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर सकता है. यही वजह है कि भारत को उम्मीद है कि अमेरिका टैरिफ के मामले में ज्यादा व्यावहारिक और सहयोगी रुख अपनाएगा.
भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में स्थिर और प्रतिस्पर्धी अवसर दिलाना है. साथ ही, दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक साझेदारी की रफ्तार बनाए रखना भी जरूरी है. ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि चुनावी झटके के बाद ट्रंप अपनी टैरिफ नीति में कोई बदलाव करते हैं या नहीं. यही फैसला भारत-अमेरिका ट्रेड डील की आगे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.

