बढ़ता फ्लैट कल्चर, घटती रिश्तों की गहराई

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
नोएडा की सुपरनोवा इमारत से 28 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर संभव जैन की आत्महत्या की घटना को सिर्फ एक पारिवारिक विवाद, कर्ज या अवसाद की कहानी मानकर आगे बढ़ जाना समस्या का सरलीकरण है. पुलिस की शुरुआती जांच में इन सभी पहलुओं की चर्चा हुई है. बच्चे के समय से पहले जन्म और उसके इलाज पर पर...

नोएडा की सुपरनोवा इमारत से 28 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर संभव जैन की आत्महत्या की घटना को सिर्फ एक पारिवारिक विवाद, कर्ज या अवसाद की कहानी मानकर आगे बढ़ जाना समस्या का सरलीकरण है. पुलिस की शुरुआती जांच में इन सभी पहलुओं की चर्चा हुई है. बच्चे के समय से पहले जन्म और उसके इलाज पर परिवार के अनुसार करीब 40 लाख रुपये खर्च होना, वैवाहिक विवाद, तलाक की प्रक्रिया, आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव आदि ने संभव की जिंदगी को मुश्किल बना दिया था. पर इन सबके पीछे वास्तव में असल कारण हमारे महानगरों में मल्टीस्टोरी बिल्डिंगों में स्थित फ्लैट कल्चर की बहुत बड़ी भूमिका सामने आ रही है. महानगर के लोग पहले ही अकेले पड़ते जा रहे थे अब फ्लैट संस्कृति उन्हें और ज्यादा अकेला बना रही है.

संभव की कहानी आज के शहरी भारत के लिए कोई असाधारण कहानी नहीं है. दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे महानगरों में लाखों परिवार ऐसे अपार्टमेंट में रह रहे हैं, जहां आसपास हजारों लोग होते हैं, लेकिन मुश्किल समय में अपनेपन का दायरा बहुत छोटा होता जा रहा है. घर के दरवाजे बंद हैं, पड़ोसी से परिचय सीमित है और रिश्तेदारों से दूरी अक्सर इतनी अधिक है कि छोटी से छोटी पारिवारिक समस्या भी पति-पत्नी के बीच निजी संघर्ष बनकर रह जाती है.

नोएडा की सुपरनोवा इमारत को इस बदलती शहरी संस्कृति के एक प्रतीक के रूप में देखना होगा.यह इमारत खुद को उत्तर भारत की सबसे ऊंची इमारत के रूप में प्रचारित करती रही है. हालांकि अभी तक शायद यह इमारत अभी तक पूरी बन नहीं सकी है. बुर्ज खलीफा ने ऊंचाई को आधुनिक महानगर की महत्वाकांक्षा का प्रतीक बना दिया है. लेकिन इसी ऊंचाई के भीतर बनती जीवनशैली का दूसरा पहलू भी है. यहां के तमाम स्टूडियो अपार्टमेंट अब शॉर्ट-स्टे और Airbnb जैसे ठहराव विकल्पों के लिए इस्तेमाल होते हैं और कपल्स के लिए आकर्षण का केंद्र हैं. समान्य अपार्टमेंट्स की तुलना में यहां रेट करीब डबल हैं. स्टेटस सिंबल के लिए लोग इस तरह की इमारतों में अनाप शनाप खर्च करने को तैयार रहते हैं.

यह भी पढ़ें: 'मैं उसकी मदद करता', सुपरनोवा बिल्डिंग सुसाइड केस पर बोले समय रैना? स्क्रीनशॉट वायरल

यह बताने का मकसद यहां किसी व्यक्ति या किसी खास वर्ग के निजी जीवन पर सवाल उठाना कतई नहीं है. सहमति से बने वयस्क रिश्ते अपने आप में सामाजिक अपराध नहीं हैं. असली सवाल उस बदलती शहरी संस्कृति का है, जिसमें स्थायी पड़ोस, पारिवारिक निगरानी और सामाजिक पहचान की जगह अस्थायी ठहराव, निजी स्पेस और गुमनाम रिश्ते तेजी से जगह बना रहे हैं.

फ्लैट कल्चर ने निश्चित रूप से जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन उसने परिवार के सामाजिक ढांचे को भी बदल दिया है. संयुक्त परिवारों में रहने की अपनी समस्याएं थीं. निजी जीवन में दखल था, बुजुर्गों का नियंत्रण था और पति-पत्नी के बीच के विवाद भी कई बार परिवार के बड़े लोगों के हस्तक्षेप से सुलझते थे. यह व्यवस्था हमेशा आदर्श नहीं थी. कई बार इसी सामाजिक दबाव ने लोगों को ऐसे रिश्तों में भी बने रहने के लिए मजबूर किया जिनमें रहना उनके लिए कष्टदायक था. लेकिन उस व्यवस्था के खत्म होने के साथ एक दूसरा संकट पैदा हुआ है. अब पति-पत्नी के बीच गंभीर तनाव हो तो उसे संभालने के लिए परिवार के पास समय, धैर्य और सामाजिक तंत्र कम बचा है. दोनों कामकाजी हैं, अलग शहरों में पले-बढ़े हैं, अपने-अपने आर्थिक फैसले लेते हैं और कई बार भावनात्मक रूप से भी अपने-अपने संसार में रहते हैं. रिश्ते में दरार आती है तो बातचीत के बजाय कानूनी रास्ता तेजी से सामने आता है. अलगाव या तलाक अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या रिश्ते टूटने के पहले संवाद की पर्याप्त कोशिश हो रही है?

इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर कम चर्चा होती है. कोई युवा दंपती चाहे कि उसके माता-पिता या सास-ससुर आकर साथ रहें, मगर आज के समय में यह पॉसिबल नहीं है. क्योंकि संपन्नता बढ़ने के साथ बुजुर्गों की अपनी आकांक्षाएं और निजी जरूरतें भी बढ़ी हैं. वे अपनी बाकी जिंदगी केवल बेटे-बहू या बेटी-दामाद के साथ रहकर समाप्त नहीं करना चाहते हैं. उन्हें अपना समय, अपनी दिनचर्या और अपना सामाजिक दायरा चाहिए.

बहुमंजिला इमारतों के छोटे फ्लैटों में उनका मन न लगना भी एक आम कारण बन गया है. गांव या पुराने शहर का खुला घर, पड़ोसियों से सहज मेलजोल, आंगन, परिचित बाजार और वर्षों से बना सामाजिक संसार अचानक लिफ्ट, बंद दरवाजों और सीमित जगह वाले अपार्टमेंट में बदल जाता है. इसलिए पीढ़ियों के बीच दूरी हमेशा केवल स्वार्थ या उपेक्षा का परिणाम नहीं होती. कई बार यह बदलती जीवनशैली और अलग-अलग जरूरतों का परिणाम भी होती है. समस्या तब बढ़ती है जब साथ रहने की इच्छा, अलग रहने की जरूरत और भावनात्मक अपेक्षाओं के बीच संवाद नहीं हो पाता.

यह भी पढ़ें: 'नहीं गिर रहा सर' बोलकर 43वीं मंजिल से कूदा युवक... नोएडा सुपरनोवा का नया वीडियो आया सामने

आज विवाह भी पहले की तरह केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक संबंध नहीं रह गया है. उसके साथ नौकरी का तनाव, ईएमआई, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य, सोशल मीडिया से पैदा हुई अपेक्षाएं, करियर की प्रतिस्पर्धा और जीवनशैली का दबाव भी जुड़ गया है. बच्चे के गंभीर इलाज पर लाखों रुपये खर्च होने जैसी परिस्थिति किसी भी युवा परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से हिला सकती है. संभव के मामले में भी कई दबाव एक साथ दिखाई देते हैं.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आधुनिक शहरी जीवन में सफलता के सारे पैमाने मौजूद हैं, लेकिन संकट के समय सहारा देने वाली व्यवस्था कमजोर है. अच्छी नौकरी है, शानदार फ्लैट है, कार है, स्मार्टफोन है, बैंक बैलेंस है, लेकिन क्या कोई ऐसा व्यक्ति भी है जिसके सामने बैठकर मन की बात कही जा सके? यही वह सवाल है जिसे महानगरों को अपने विकास मॉडल के साथ पूछना होगा.

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी हमारी सामाजिक समझ अभी बहुत पीछे है. अवसाद को अक्सर कमजोरी, असफलता या क्षणिक निराशा समझ लिया जाता है. कोई व्यक्ति लगातार चुप हो जाए, लोगों से कटने लगे, नींद और व्यवहार में बदलाव आए या बार-बार जिंदगी खत्म करने की बात करे तो परिवार को इसे गंभीर चेतावनी मानना चाहिए. ऐसे संकेतों को “सब ठीक हो जाएगा” कहकर टालना पर्याप्त नहीं है.

परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं है. परिवार का अर्थ है—किसी व्यक्ति के टूटने से पहले उसके भीतर चल रहे संघर्ष को पहचान लेना. पति-पत्नी के रिश्ते में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन हर असहमति को युद्ध में बदल देना समाज के लिए खतरनाक है. आर्थिक संकट, तलाक, बच्चों की बीमारी या करियर की विफलता जीवन के अंत का पर्याय नहीं हो सकते.

महानगरों को केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बेहतर सुविधाओं से आधुनिक नहीं बनाया जा सकता. आधुनिक शहर वह होगा जहां अकेले रहने वाला व्यक्ति भी सामाजिक रूप से अकेला न हो. जहां अपार्टमेंट सोसाइटी सिर्फ पार्किंग, मेंटेनेंस और सुरक्षा की व्यवस्था न हो, बल्कि पड़ोसियों के बीच मानवीय संपर्क का भी माध्यम बने. कार्यस्थलों पर भी मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लिया जाए और परिवारों में संवाद को कमजोरी नहीं, ताकत माना जाए.

संभव जैन की मौत की वास्तविक वजह जांच से ही स्पष्ट होगी. इसलिए इस घटना को किसी एक कारण या किसी एक रिश्ते के खाते में डालना उचित नहीं होगा. लेकिन यह त्रासदी हमें इतना जरूर याद दिलाती है कि महानगरों की चमक के पीछे एक ऐसा समाज भी बन रहा है जिसमें लोग भीड़ के बीच तेजी से अकेले होते जा रहे हैं. ऊंची इमारतें हमारे शहरों की ऊंचाई बढ़ा सकती हैं, लेकिन रिश्तों की गहराई हमें खुद बढ़ानी होगी. वरना आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही होगी कि हमारे घर बड़े होते जाएं और उनमें रहने वालों का अकेलापन भी उसके अनुपात में उतना ही बढ़ता जाएगा.

Original Source
https://www.aajtak.in/opinion-analysis-/story/noida-supernova-suicide-flat-culture-urban-loneliness-relationships-depth-ntc-ksrj-rpti-2661418-2026-10-05?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in Business