'आपने रॉन्ग नंबर मिलाया, जाओ प्रोटेस्ट करो...', याचिकाकर्ता को CJI का जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों को समय-समय पर बदलने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दिलचस्प टिप्पणी करते हुए कहा कि आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं. यह विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी का अच्छा मौसम है, आप भी ऐसा कर सकते हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन की व्यवस्था लागू करना विधायिका का काम है, न्यायपालिका का नहीं.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ SC-ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में लंबे समय से रोटेशन नहीं किए जाने के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई कर रही थी. याचिकाकर्ता की दलील थी कि कई निर्वाचन क्षेत्र 1972 से आरक्षित बने हुए हैं. इससे कुछ चुनिंदा परिवारों को बार-बार चुनाव लड़ने का मौका मिलता है और मतदाताओं के सामने उम्मीदवार चुनने के विकल्प सीमित हो जाते हैं.
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा, 'आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं. यह विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी का अच्छा मौसम है. आप भी ऐसा कर सकते हैं.' चीफ जस्टिस ने आगे कहा कि लोगों को अपनी आवाज उठानी चाहिए और विधायिका से इस मुद्दे पर कार्रवाई की मांग करनी चाहिए. उन्होंने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि इस विषय पर विधायिका कुछ कदम उठाए.
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण का मुद्दा संवैधानिक संस्थाओं और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है. उन्होंने कहा कि भले ही मतदाताओं के सामने उम्मीदवारों के विकल्प सीमित हों, लेकिन इससे उनका मतदान का अधिकार समाप्त नहीं होता. जस्टिस बागची ने कहा, 'आपके विकल्प सीमित हो सकते हैं, लेकिन आपका वोट देने का अधिकार बरकरार है.'
उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई कानूनी प्रावधान स्पष्ट रूप से मनमाना पाया जाता है, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है या उसकी सीमित व्याख्या कर सकती है. लेकिन आरक्षित सीटों के रोटेशन की नई व्यवस्था लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों को दोबारा नहीं लिखा जा सकता. जस्टिस बागची ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'हम संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते.'
याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि कई निर्वाचन क्षेत्र दशकों से SC-ST समुदायों के लिए आरक्षित हैं. रोटेशन की व्यवस्था नहीं होने से कुछ सीटों पर एक ही तीन-चार परिवारों के सदस्य बार-बार चुनाव लड़ते रहे हैं. याचिका में कहा गया कि इससे मतदाताओं के सामने उपलब्ध विकल्प सीमित हो जाते हैं और उनके मतदान के अधिकार का प्रभाव कमजोर पड़ता है.
याचिकाकर्ता ने मांग की कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में समय-समय पर रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए, ताकि लंबे समय से आरक्षित सीटों की स्थिति बदली जा सके. इसके समर्थन में परिसीमन आयोग की 2008 की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों का भी हवाला दिया गया.
याचिकाकर्ता ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को चुनौती दी थी. उनका कहना था कि परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बावजूद SC-ST के लिए आरक्षित सीटों में रोटेशन की व्यवस्था लागू नहीं की गई. याचिकाकर्ता के वकील ने पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था का भी हवाला दिया. उन्होंने दलील दी कि लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों के लिए भी इसी तरह का प्रावधान होना चाहिए.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिसीमन से जुड़े दिशा-निर्देश उस प्रक्रिया के दौरान लागू होते हैं और उनसे आरक्षित सीटों का लगातार या निश्चित अंतराल पर रोटेशन करना अनिवार्य नहीं हो जाता.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका के जरिए इस तरह की नई व्यवस्था लागू करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता. जस्टिस बागची ने कहा कि नगर निकाय और पंचायत चुनावों में सीटों के रोटेशन की व्यवस्था अलग संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित होती है. अदालत ने कहा कि निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन विधायी प्रक्रिया है. न्यायपालिका अपने स्तर पर नई रोटेशन व्यवस्था लागू करने का आदेश नहीं दे सकती.
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले से असहमति जताने का कोई आधार नहीं पाया. हाई कोर्ट ने माना था कि रोटेशन की व्यवस्था वांछनीय हो सकती है, लेकिन इसे लागू करने का निर्णय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है.
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता और मतदाता इस मुद्दे को अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों के सामने उठाएं. उन्होंने कहा कि मतदाता अपने प्रतिनिधियों से कह सकते हैं कि अगर परिसीमन और आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया, तो वे उन्हें वोट नहीं देंगे. अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जनप्रतिनिधियों से संपर्क करने और परिसीमन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक रोटेशन व्यवस्था लागू कराने के लिए उन्हें राजी करने को स्वतंत्र हैं.

